‘पाश’ की कविता ‘सबसे ख़तरनाक’ – pash poem sabse khatarnak

आज इस लेख में हम पाश की कविता सबसे ख़तरनाक (pash poem sabse khatarnak) को पढ़ेंगे। लेकिन किसी भी कविता को पढ़ने से पहले यह जानना भी ज़रूरी होता है कि इसे किस कवि ने लिखा है और किन परिस्थितियों में लिखा है। तो आइये संक्षिप्त में अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की जीवनी को पढ़ते है।

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अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की जीवनी संक्षिप्त में – pash biography in hindi

कवि पाश का पूरा नाम अवतार सिंह संधू था। पाश उनका उपनाम था। पाश का जन्म 9 सितम्बर 1950 को तलवण्डी सेलम, जालंधर पंजाब में हुआ। यह वह दौर था जब बंगाल का नक्सली आंदोलन अपने चरम पर था। उस आंदोलन से पंजाब भी प्रभावित हुआ और जमींदारों के खिलाफ एक आंदोलन उठ खड़ा हुआ।

पाश पर इसका असर हुआ और वे जनवाद की आवाज उठाने लगे. उनकी कविताओं पर पकड़ ने उन्हें जल्दी ही मशहूर कर दिया और 1970 में उनकी पहली किताब लौह कथा आई। वे पंजाब में वामपंथ की प्रमुख आवाज बनकर उभरे। अपने काम की वजह से वजह से उन्हें 2 साल जेल में भी बिताने पड़े. उन पर हत्या का मुकद्मा चलाया गया जो साबित नहीं हो पाया और उन्हें रिहा कर दिया गया। उन्होंने मैगजीन का संपादन भी किया। 1986 में उन्हें युनाइटेड किंगडम जाने का मौका मिला। वे पंजाब के आंतकवाद में विरोध में भी अपनी बात कहते रहे. उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रही।

1988 में खालिस्तानी आंतकियो द्वारा उन्हें और उनके एक दोस्त हंसराज को गांव में गोली मार कर हत्या कर दी गई और जनवाद की इस प्रबल आवाज को खामोश कर दिया गया। उनकी हत्या से उनकी कविताओं को और अधिक प्रसिद्धि मिली और वे अपनी कविताओं के माध्यम से आज तक अभिव्यक्त होते रहते हैं। 23 मार्च 1988 को जब उनकी हत्या की गई तब वे महज 37 साल के थे.

‘पाश’ की कविता ‘सबसे ख़तरनाक’ – sabse khatarnak poem by pash

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मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

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