अंतरराष्ट्रीय तापनाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र International Thermonuclear Experimental Reactor

ITER – अंतरराष्ट्रीय तापनाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र ( International Thermonuclear Experimental Reactor in hindi)

ITER का पूरा नाम ( Iter Full form) अंतरराष्ट्रीय तापनाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र ( International Thermonuclear Experimental Reactor) है। आज इस लेख में हम International Thermonuclear Experimental Reactor के बारे में विस्तार से जानेंगे। की यह क्या होता है, यह कैसे काम करता है। इसकी जरूरत क्यों है। कौन कौन से देश मिलकर इसे बना रहे है। कहा इसे स्थापित किया जाएगा आदि।

कृत्रिम सूर्य क्या है? What is an artificial sun?

कृत्रिम सूर्य का नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में जो सवाल उठता है, वो ये की क्या हम कृत्रिम सूर्य बना सकते है? ( Can we create sun? ) तो इसका जवाब है, हाँ हम बना सकते है।

आईटीईआर(ITER) को ही कृत्रिम सूर्य कहा जाता है, क्योंकि इसमें भी सूर्य की भांति ही नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया द्वारा बड़े पैमाने पर ऊर्जा को उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा है,इसलिए इसे कृत्रिम सूर्य भी कहा जाता है।

कृत्रिम सूर्य की जरूरत क्यों है? (Why we need to create an artificial sun? )

वर्तमान समय मे सम्पूर्ण विश्व ऊर्जा की समस्या से जूझ रहा है, और इसलिए वो पम्परागत से गैर-परम्परागत स्त्रोतों की और रूख कर रहा है। साथ ही साथ वह यह भी प्रयत्न कर रहा है की कैसे कम से कम इनपुट ऊर्जा से ज्यादा से ज्यादा आउटपुट ऊर्जा प्राप्त कर सके। ( use of artificial sun ) और कृत्रिम सूर्य इसी का एक उदाहरण है। ताकि ऊर्जा की कमी की समस्या से निपटा जा सके।

और इसी समस्या से निबटने के लिए भारत सहित विश्व के कई राष्ट्रों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय  परमाणु ऊर्जा एजेंसी के सहयोग से मिलकर बनाया जा रहा संलयन नाभिकीय प्रक्रिया पर आधारित ऐसा विशाल रिएक्टर है, जो कम ईंधन की सहायता से ही अपार ऊर्जा उत्पन्न करेगा।सस्ती, प्रदूषणविहीन और असीमित ऊर्जा पैदा करने की दिशा में हाइड्रोजन बम के सिद्धांत पर इस नाभिकीय महापरियोजना को प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया है। इसमें संलयन से उसी प्रकार से ऊर्जा मिलेगी जैसे पृथ्वी को सूर्य या अन्य तारों से मिलती है।

यह कैसे काम करेगा। (how does ITER work?)

कृत्रिम सूर्य का प्रयोग ITER नामक भट्टी में किया जाएगा। जो कि एक प्रकार का नाभिकीय संलयन द्वारा होने वाला प्रयोग है।नाभिकीय संलयन के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह एक अनियंत्रित अभिक्रिया है।इस अभिक्रिया में हाइड्रोजन के परमाणुओं को अत्यधिक उच्च तापमान तक गर्म किया जाता है, इस तापमान पर हाइट्रोजन के परमाणु आपस में जुड़कर हीलियम के परमाणु को जन्म देते हैं और भारी ऊर्जा पैदा होती है। एक किलोग्राम द्रव्यमान के संलयन से एक करोड़ किलोग्राम पेट्रोलियम  इंधन के बराबर ऊर्जा पैदा हो सकती है।  इस अनुसंधान के अंतर्गत 50 मेगावाट ऊर्जा के उपयोग से 500 मेगावाट की ऊर्जा जनित की जाएगी।

              H+H——->He+ energy

अनुसंधान में कुल विश्व के 7 राष्ट्र मिलकर काम कर रहे हैं।

यह 7 राष्ट्र निम्न है :-

यूरोपियन यूनियन,भारत, चीन, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया, यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका

International Thermonuclear Experimental Reactor
International Thermonuclear Experimental Reactor

जिसमें 45% खर्चा यूरोपियन यूनियन उठाएगा और बाकी सभी देश लगभग 9% इसमें योगदान देंगे। इसमें इस अनुसंधान कार्य के लिए 2006 में हस्ताक्षर हुआ। जिसके  निर्माण कार्य में कुल 10 वर्ष का समय अनुमानित है। इस रिएक्टर को साउथ फ्रांस में लगाया जाएगा।

# International Thermonuclear Experimental Reactor upsc

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