भारत मे इच्छा मृत्यु (Euthanasia in india)

इच्छा मृत्यु (Euthanasia) से संबंधित तथ्य (Euthanasia in hindi)

Euthanasia in india
Euthanasia in india

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने मई 2005 में एक एनजीओ कॉमन कॉज़  की बीमार व्यक्ति को इच्छा मृत्यु (Euthanasia) देने की याचिका पर सुनवाई करते हुए 13 साल बाद 9 मार्च 2018 को फैसला सुनाते हुए इच्छा मृत्यु को मंजूरी दे दी है और कहा कि “जीने की मौलिक अधिकार में गरिमापूर्ण तरीके से मरने का अधिकार भी शामिल है,इसलिए इच्छा मृत्यु को मंजूर किया जाता है।” और इस प्रकार भारत विश्व का 22वां देश बन गया है,जहां इसे मंजूरी मिल गई है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि  सुप्रीम कोर्ट ने केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु की याचिका पर सुनवाई की है।सक्रिय इच्छामृत्यु पर कोई सुनवाई नहीं की है।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia )

इस तरीके में मरीज़ का इलाज बंद कर दिया जाता है अथवा लाइफ स्पोर्ट सिस्टम को हटा दिया जाता है। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने इसी का अधिकार दिया है।

सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia )

इस तरीके में मरीज़ के ठीक न हो सकने वाली बीमारी की हालत में उसे ऐसी दवा देना ताकि मरीज को राहत मिले पर बाद में मौत हो जाए।यह कुछ देशों में ही वैध है। इस पर कोई फैसला सुप्रीम कोर्ट नहीं दिया है।

जब तक इस पर कानून नही बन जाता है तब तक सुप्रीम कोर्ट की ये गाइडलाइन जारी रहेगी:-

मृत्यु के लिए वसीयत बनाना।

इस प्रकार भारत में सुप्रीम कोर्ट ने स्वस्थ रहते हुए व्यक्ति द्वारा इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) को मान्यता दी है,और यह प्रावधान किया है कि यह वसीयत दो स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति में मजिस्ट्रेट के सामने प्रमाणित होगी।जिसकी एक कॉपी परिवार के पास जमा होगी तथा अन्य मजिस्ट्रेट,डिस्ट्रिक्ट जज तथा नगर निगम के पास रहेगी। इस वसीयत पर अमल के लिए सर्वप्रथम परिवार की मंजूरी आवश्यक होगी। उसके बाद उन्हें  हाईकोर्ट में अर्जी लगानी होगी। उसके बाद हाईकोर्ट एक मेडिकल बोर्ड का गठन करेगा। मेडिकल बोर्ड की पुष्टि पर ही इच्छा मृत्यु की मंजूरी कोर्ट द्वारा दी जाएगी

वसीयत न बना पाने पर।

स्वस्थ रहते हुए ऐसी वसीयत न बना पाने पर बीमार होने की स्थिति में परिवार की मंजूरी आवश्यक होगी तथा उसके बाद हाईकोर्ट में अर्जी लगानी होगी इच्छा मृत्यु के लिए। उसके बाद हाईकोर्ट मेडिकल बोर्ड गठित करेगा और मेडिकल बोर्ड की पुष्टि पर ही इच्छा मृत्यु की मंजूरी कोर्ट द्वारा दी जाएगी।

भारत का चर्चित मामला

अरुणा शानबाग का मामला

  • 42 साल तक कोमा में रहीं अरुणा शानबाग की 18 मई 2015 को मौत हो गई थी। अरुणा 1973 में मुंबई के केईएम हॉस्पिटल में रेप की शिकार हुई थीं। उन्हें इच्छा या दया मृत्यु देने की मांग करती जर्नलिस्ट पिंकी वीरानी की पिटीशन सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च 2011 को ठुकरा दी थी। वे पूरी तरह कोमा में न होते हुए दवाई और भोजन ले रही थीं। डॉक्टरों की रिपोर्ट के आधार पर अरुणा को इच्छा मृत्यु देने की इजाजत नहीं मिली।
  • मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) हॉस्पिटल में दवाई का कुत्तों पर एक्सपेरिमेंट करने का डिपार्टमेंट था। इसमें नर्स कुत्तों को दवाई देती थीं। उन्हीं में एक थीं अरुणा शानबाग। 27 नवंबर 1973 को अरुणा ने ड्यूटी पूरी की और घर जाने से पहले कपड़े बदलने के लिए बेसमेंट में गईं। वार्ड ब्वॉय सोहनलाल पहले से वहां छिपा बैठा था। उसने अरुणा के गले में कुत्ते बांधने वाली चेन लपेटकर दबाने लगा। छूटने के लिए अरुणा ने खूब ताकत लगाई। लेकिन, गले की नसें दबने से बेहोश हो गईं। अरुणा कोमा में चली गईं और कभी ठीक नहीं हो सकीं

विदेशों मे स्थिति

ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस और इटली जैसे यूरोपीय देशों सहित दुनिया के ज्यादातर देशों में इच्छा मृत्यु गैर-कानूनी है।

लेकिन इन देशों में मौजूद है इच्छा मृत्यु का कानून
अमेरीका– यहां सक्रिय इच्छा मृत्यु गैर-क़ानूनी है लेकिन ओरेगन, वॉशिंगटन और मोंटाना राज्यों में डॉक्टर की सलाह और उसकी मदद से मरने की इजाजत है।
स्विट्जरलैंड– यहां ख़ुद से ज़हरीली सुई लेकर आत्महत्या करने की इजाजत है, हालांकि इच्छा मृत्यु ग़ैर-क़ानूनी है।
नीदरलैंड्स– यहां डॉक्टरों के हाथों सक्रिय इच्छा मृत्यु और मरीज की मर्ज़ी से दी जाने वाली मृत्यु पर दंडनीय अपराध नहीं है।
बेल्जियम– यहां सितंबर 2002 से इच्छा मृत्यु वैधानिक हो चुकी है।

दुनिया का चर्चित मामला

अमेरिका की टेरी शियावो दुनिया भर में चर्चा में रही। टेरी 19 नवंबर में  1990 में घर में हार्ट फेल होने की वजह से गिरी और कोमा में चली गई 10 साल बाद उसके पति ने डॉक्टर से कहा कि टेरी का लाइव सपोर्ट सिस्टम निकाल दे परंतु टेरी के माता पिता इसके लिए तैयार नहीं थे।तब देश में बहस छिड़ गई की यदि लाइफ सपोर्ट हटा दिया जाएगा तो इच्छामृत्यु को मान्यता मिल जाएगी। मामला अमेरिका की संसद कांग्रेस तक गया ।जहां बहस हुई कोई फैसला आता उसके पहले ही टेरी की मृत्यु हो गई परंतु फैसला टेरी के पति के पक्ष में ही आया|

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